वनाधिकार क़ानून के दस साल बाद भी नहीं बदले हालात, क्या रही वजह…


नई दिल्ली।
साल 2006 में जब वनाधिकार क़ानून लागू किया गया था ।  वनाधिकार क़ानून लागू करने का मक़सद था कि आदिवासियों के साथ हुए अन्याय की पूर्ति की जा सके। आज दस साल बाद सरकारी आंकड़ों पर नज़र डालने पर पता चलता है कि आदिवासियों को क़ानून तो मिला, पर वो हक़ नहीं मिला, जो देने की बात की गई थी।

पिछले 10 साल में देशभर में लगभग 42 लाख दावे इस क़ानून के तहत किए गए, पर करीब 17 लाख आवेदनों का ही निपटारा किया गया।  वनाधिकार क़ानून के तहत व्यक्तिगत और सामुदायिक दोनों प्रकार के दावे करने का प्रावधान था। आंकड़ों को अनुसार व्यक्तिगत दावे 40,72,241 आए, जिनमें से 16,40,160 दावों का निराकरण किया गया। 1 लाख 10 हज़ार सामुदायिक दावों में से साढ़े 44 हज़ार दावों का ही निराकरण किया गया।

वनाधिकार कानून का सही तरीके से लागू नहीं हो पाने की बड़ी वजह है  कि इसकी निगरानी का काम वन विभाग को दिया गया और क्रियान्वयन का काम आदिवासी विकास विभाग को। जिन आदिवासियों को ज़मीन का हक़ मिलना है, वह जमीन वन विभाग के पास है।  इसलिए लगातार टकराव की स्थिति बनी रहती है। ­­­­­­­­­­महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, गुजरात ऐसे राज्य हैं, जहां आदिवासियों की संख्या अधिक है। आंकड़ों पर नजर डालें, तो त्रिपुरा की स्थिति सबसे अच्छी है, यहां 2 लाख आवेदनों में से सवा लाख आवेदकों को उनका हक दे दिया गया।

छत्तीसगढ़ जैसे आदिवासी बहुल्य राज्य में साढ़े 8 लाख आवेदनों में से साढ़े तीन लाख दावों का निराकरण किया गया है,।  इस राज्य में एक भी दावा समुदाय की तरफ से नहीं आया। सामुदायिक दावे बिहार में भी नहीं आए। यहां व्यक्तिगत 8 हजार दावों में से कुल 222 मामलों का ही निराकरण किया गया। दक्षिण भारत के राज्य केरल और तमिलनाडु में सामुदायिक दावे तो काफी आए, पर निराकरण किसी का नहीं हुआ। सामुदायिक दावे सबसे अधिक मध्य प्रदेश में आए, यहां 41 हजार दावों में से 24 हजार दावों का निराकरण किया गया। व्यक्तिगत दावे में दूसरा नम्बर उड़ीसा का है, जबकि जनसंख्या के लिहाज से मध्य प्रदेश में सबसे अधिक आदिवासी रहते हैं।

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