रेल हादसों का क्या है सच, जानिए हक़ीक़त

train accident

इंज़माम वहीदी, नई दिल्ली: भारत में अंतर्देशीय परिवहन के लिए रेल सबसे बड़ा माध्यम है। दुनिया के सबसे बड़े रेल नेटवर्क में से एक भारत में हर रोज़ सवा दो करोड़ से भी ज़्यादा यात्री सफ़र करते हैं जबकि 87 लाख टन के आसपास सामान ढोया जाता है। कुल 64,600 रूट के ट्रैक पर जरा-सी गफ़लत लाखों लोगों की जान को जोखिम में डाल सकती है। ऐसे में इन पटरियों पर यात्रियों और इनके आसपास से गुज़रने वालों की सुरक्षा पर ख़ास ध्यान देने की ज़रूरत से इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन यह हो नहीं पाता, और यही वजह है कि हर साल हादसों से दो-चार होना पड़ता है। देश की रेल व्यवस्था की ख़ास बात यह है कि पहले से पता ख़ामियों को दूर किए बिना ही हर साल रेल नेटवर्क के विस्तार पर जोर होता है। राजनीतिक कारणों से नए स्टेशन बनाए जाते हैं। नई पटरियां घोषित की जाती हैं, नए कोच कारखाने लगाए जाते हैं, पुराने स्टेशनों का दर्जा बढ़ाया जाता है। रेल बजट में भी बढ़ोतरी होती है। लेकिन घाटा बरकरार रहता है।

एक मुद्दत से रेल विभाग में पैसे का टोटा है। पिछला वर्ष भी ऐसा था। लेकिन जहां से पैसा आ सकता है, वहां से इकट्ठा करने के राजनीतिक जोखिम हैं। जाहिर है कि यही वजह है कि 2015 के रेल बजट में किराए में बढ़ोतरी का कोई प्रस्ताव नहीं था। लेकिन अगले पांच वर्ष में 1,38,000 किलोमीटर नई पटरियां बिछाने का प्रस्ताव ज़रूर था।

रेलवे विभाग में होने वाले हादसों पर अब तक के मनन-मंथन के बाद यह पाया गया है कि 80 फ़ीसद दुर्घटनाएं मानवीय चूक के कारण होती हैं। और इसका आधे से ज़्यादा बड़ा हिस्सा मानवरहित क्रॉसिंग पर ही घटित होता है। सरकारी आंकड़ों पर नज़र डालें तो 2011-12 में जो 115 रेल दुर्घटनाएं हुर्इं, उनमें से 87.78 फ़ीसद मानवीय भूल के कारण हुर्इं। उनमें से भी 52 रेलवे विभाग के कर्मचारियों और 63 दूसरे लोगों की ग़लती से हुर्इं। लेकिन इसमें राहत की यही बात रही कि वैश्विक स्तर पर मान्य रेलवे सुरक्षा मानकों की कसौटी पर दुर्घटनाओं में कमी हुई और तालिका में यह कमी 0.15 से कम होकर 0.13 हो गई। लेकिन असल में यह राहत बड़ी मामूली है और इससे कोई प्रशस्ति हासिल करने की उम्मीद करना भी बड़ी भूल है।

रेलवे व्यवस्था में जो चीज़ दुर्घटनाओं का सबब बन रही है, वह है मानवरहित रेलवे फाटक। देश में दो वर्ष पहले तक 30 हज़ार से भी ज़्यादा रेलवे क्रॉसिंग थे। उनमें 11563 मानवरहित और 18785 दूसरे रेलवे फाटक थे। क़रीब 40 फ़ीसद हादसे इन फाटकों पर ही होते हैं। इस बजट में भी यह प्रावधान रखा गया है कि 3000 मानवरहित फाटक ख़त्म किए जाएंगे जबकि 917 ओवरब्रिज बनाए जाएंगे। लेकिन यह आंकड़ा कभी भी पूरी कामयाबी से दर्ज नहीं होता और ज़्यादातर पर काम साल पूरा होने तक भी अधूरा ही रहता है। भारतीय रेलवे के ‘विज़न 2020’ में यह प्रण है कि मानवरहित फाटक पूरी तरह ख़त्म करने हैं।

रेलवे की एक समीक्षा समिति ने 2012 में अपनी एक रिपोर्ट में पाया था कि हर साल 1500 लोग इन फाटकों पर अपनी जान से हाथ धो बैठते हैं। इनमें से ज़्यादातर लोग इन्हें पार करने की जल्दी में अपने प्राण दे बैठते हैं। इन मौतों पर आरोप-प्रत्यारोप और क़ानूनी पेचीदगियां अपनी जगह, लेकिन यह तथ्य अपनी जगह क़ायम है कि देश की रेल व्यवस्था का यह एक ऐसा पहलू है जिस पर क़ाबू पाकर इसे ‘सामूहिक जनसंहार’ के आरोप से तो एक हद तक बचाया जा ही सकता है। फिलहाल ऐसी योजना है कि 2017 तक 30,348 रेलवे क्रॉसिंग में से 10,797 को तो सिरे से ही ख़त्म कर दिया जाए। यह फ़ैसला भी किया जा चुका है कि कोई और नई क्रॉसिंग भविष्य में पटरियों पर न हो।

रेलवे का 2016-17 का अनुमानित बजट 1 लाख 21 हज़ार करोड़ का है, जिसमें पिछले बजट की तुलना में 21 फ़ीसदी का इजाफ़ा हुआ है। रेलवे की सुरक्षा पर बजट में 2661 करोड़ रुपये का प्रावधान है। इनमें 60 फ़ीसदी रक़म पटरियों के नवीनीकरण और रखरखाव पर ख़र्च होती है जबकि 25 फीसदी रकम दुर्घटनारोकी उपकरणों पर होती है। फिर भी रेलवे अपनी टूटी फूटी पटरियों पर मौत बांटता फिर रहा है।

प्रधानमंत्री ने सुरेश प्रभु को रेल मंत्री बनाया था कि वो रेल को कमाई और सुरक्षा की पटरी पर ले आएंगे लेकिन प्रभु के राज में रेलवे पर कई सवाल उठा रहा है। 1. पुखराया में रेल ट्रैक में टूटी थी तो इसका पता पहले क्यों नहीं चला? 2. ट्रैक में दरार थी तो ट्रेन चलाने का फैसला क्यों लिया गया? 3. किराया तो बढ़ जाता है लेकिन सफर में सुरक्षा की गारंटी क्यों नहीं लेती सरकार? 4. पुलों और पटरियों पर ठोस योजना कब तक बनेगी? 5. आख़िर रेलवे में सुरक्षा श्रेणी में 86 हजार से ज्यादा पोस्ट खाली क्यों पड़े हैं? 6. क्या ऐसी ही बदइंतज़ामी की पटरी पर दौड़ेगी बुलेट ट्रेन?

ऐसे फैक्टस बताते हैं जिनसे आपको ये समझने में आसानी होगी की आपकी मंगलमय यात्रा की कामना करने वाली रेलवे सुरक्षा इंतज़ामों पर अमल करने में कितनी सुस्त है। 1. रेलवे की सुरक्षा से संबंधित काकोदर कमेटी ने कई अहम सिफारिशें की थीं जो आज भी ठंडे बस्ते में धूल खा रही हैं। 2. समिति ने कहा था कि अगर भारतीय रेलवे ने जल्द ही ज़रूरी इंतज़ाम नहीं किए तो रेलवे का पूरा सिस्टम ध्वस्त हो सकता है। 3. काकोदर कमेटी ने रेलवे सेफ्टी ऑथरिटी बनाने की सिफ़ारिश की थी जिस पर अमल नहीं हुआ। 4. कमेटी की वो सिफ़ारिश भी टांय-टांय फिस्स ही रही जिसमें पांच सालों के भीतर करीब 19 हज़ार किलोमीटर रेल रूट पर एडवांस सिग्नल सिस्टम लगाने को कहा गया था। इसमें 20 हजार करोड़ रुपए ख़र्च होना था। 5. कमेटी ने 50 हज़ार करोड़ के ख़र्च पर देश भर की रेलवे क्रॉसिंग को अपडेट करने की सिफारिश की थी। 6. कमेटी की उस सिफ़ारिश पर भी आधे-अधूरे तरीक़े से अमल हुआ जिसमें 10 हज़ार करोड़ की लागत से आधुनिक एलएचबी डिब्बे लगाने को कहा गया था।

फेडरेशन के मुताबिक रेल मंत्रालय का विजन स्पष्ट नहीं है। रेलवे के सेफ्टी और सेक्यूरिटी डिविजन में करीब डेढ़ लाख पद खाली हैं। वहीं NCR डिविज़न में दो हज़ार गैंगमैन के पद खाली हैं। रेल सुरक्षा से जुड़ी काकोड़कर समिति की रिपोर्ट को अभी लागू करना बाकी है। साथ ही रेलवे में बचाव और सुरक्षा के लिए डेढ़ लाख करोड़ रुपयों की दरकार है, लेकिन इस दिशा में कोई क़दम नहीं उठाया गया है।

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