भारत के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का महान पर्व है रक्षाबंधन

लक्ष्मीकांता चावला, 22 अगस्त : रक्षाबंधन का प्रारंभ कब हुआ इस विषय में कुछ निश्चित नहीं कहा जा सकता, लेकिन भविष्य पुराण में वर्णन मिलता है कि देव और दानवों में जब युद्ध शुरू हुआ तब दानव देवताओं पर भारी पड़ते नजर आने लगे, देवेंद्र हारने लगे। तब इंद्र घबराकर बृहस्पति जी के पास गए। बृहस्पति जी के निर्देशानुसार इंद्र पत्नी ने रेशम का धागा मंत्रों की शक्ति से पवित्र करके अपने पति की हाथ पर बांध दिया। संयोग से यह श्रावण पूर्णिमा का दिन था। जन विश्वास यह बना कि इंद्र देवासुर संग्राम में इसी धागे की मंत्र शक्ति से ही विजयी हुए। ऐसा माना जाता है कि उसी दिन से श्रावण पूर्णिमा के दिन रक्षाबंधन का धागा बांधने की प्रथा प्रारंभ हुई, जो आज तक विभिन्न नाम और रूप से पूरे देश और जहां भी देशवासी
दूर देशों में बसे हैं वहां तक चली आ रही है। इतिहास के शानदार पृष्ठों से भी राखी का संबंध है। राजपूताने की राखी वैसे तो बहुत प्रसिद्ध है और कई वीर गाथाएं इसके साथ जुड़ी हैं, पर महारानी कर्मवती के धागे की कथा विशेष प्रसिद्ध है। मेवाड़ की रानी कर्मवती पर जब बहादुर शाह ने आक्रमण कर दिया तो वीरता से शत्रुओं का सामना करती हुई कर्मवती ने हुमायूं को राखी भेज कर मदद की प्रार्थना की। हुमायूं ने राखी की लाज रखी और मेवाड़ पहुंच कर बहादुर शाह के विरुद्ध युद्ध किया तथा राज्य की रक्षा की। दक्षिण भारत के धर्म ग्रंथों और महाभारत में भी किसी न किसी रूप में राखी का उल्लेख है। विशेष प्रसंग सन 1905 के बंग-भंग आंदोलन से जुड़ा है। जब लाॅर्ड कर्जन ने बंगाल के विभाजन का फैसला कर ही लिया तब पूरा बंगाल एकमत से बंग-भंग के विरुद्ध खड़ा हो गया और तब जन जागरण के लिए रक्षाबंधन का ही सहारा लिया गया। श्री रवीन्द्र नाथ टैगोर ने बंग भंग का विरोध करते समय रक्षाबंधन त्यौहार को बंगाल निवासियों के आपसी भाईचारे तथा एकता का प्रतीक बनाकर इस पर्व का देश की आजादी के लिए उपयोग किया। 16 अक्टूबर 1905 को बंग भंग की नियत घोषण के दिन रक्षाबध्ं ान की योजना साकार हुई और इसी धागे के सहारे आमजन गंगा स्नान करके सड़कों पर यह कहते हुए उतर आए- सपत कोटि लोकेर करुण क्रंदन, सुनेना सुनिल कर्जन दुर्जन ताइ निते प्रतिशोध मनेज मतन करिल, आमि स्वजने राखी बंधन। बंगाल वासियों को यह आह्वान किया गया कि आओ राखी के बंधन में बंध कर हम कर्जन के अत्याचारों का सामना करें।
आज अधिकतर लोग, परिवार और बहनें रक्षाबंधन को भाई बहन के प्यार का पर्व मानकर ही मनाते हैं। कहा जाता है कि कच्चे धागों से पक्के रिश्ते बनते हैं। कोई अपरिचित भी राखी बंधवा ले तो वह जीवन भर के लिए भाई बहन का रिश्ता निभाते हैं। इस दिन बहनें अपने भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांध कर आशीर्वाद देती हैं और भाई भी अपनी बहनों को उपहार आदि देकर जीवन भर यह संबंध प्यार और संरक्षण से निभाने का प्रण लेते हैं। पर धीरे-धीरे यह त्यौहार प्यार के साथ औपचारिकता भी बन गया और महंगे उपहार देने-लेने और दिखावे का एक साधन बन गया। विवाहिता लड़कियों के माता-पिता को तो राखी पर भी मोटा माल ही देना पड़ता है। जो भी है यह भारत की पहचान है। भाई बहन के संबंधों को सशक्त करता धागा है, त्यौहार है।
मैं स्वयं भारत की भाग्यशाली बेटियों में से एक हूं, जिसने 1968 की राखी के दिन ही वाघा सीमा पर सीमा सुरक्षा बल के जवानों को राखी बांधी। तब ऐसा नहीं लगता था कि सीमा प्रहरी जवानों को राखी बांधने का यह क्रम निर्बाध चलता रहेगा और आधी सदी पार कर लेगा। काॅलेज अध्यापिका के रूप में यह कार्यक्रम प्रारंभ हुआ। आज तक हजारों विद्यार्थी बेटियां इस कार्यक्रम में शामिल हुईं। जिनके घर में भाई नहीं थे वे तो अत्यंत भावुक होकर ही राखी बांधती हैं, पर उन जवानों की भावुकता भी अथाह हो जाती है जो घरों से दूर जंगलों में, पहाड़ों में, सागर की लहरों से जूझते हुए देश की रक्षा करते हैं। एक सीआरपीएफ जवान की आंखों से राखी बंधवाते समय जो आंसू आज से पच्चीस वर्ष पूर्व मैंने बहते और हाथों को भिगोते महससू किए थे वे
गंगा जल से कम पवित्र नहीं थे। उसने राखी बांधने वाली बहन के सिर पर हाथ रखकर कहा- 26 वर्ष बाद किसी बहन के हाथ से राखी बंधवाई है अन्यथा जो लिफाफा बंद राखी घर से आती थी वही एक दूसरे बंधवा लेते थे। वाघा सीमा पर ही एक बार वर्षा ऋतु के दिनों में सांप के काटने से जवानों के साथ दुर्घटना हो गई तब भी उन बहादुर भारत पुत्रों ने यह कहा कि एक दिन की राखी हमें 365 दिन देश के दुश्मनों से लोहा लेने और टक्कर देने की हिम्मत दे जाती है। जब पंजाब में आतंकवाद का भयानक अंधेरा छाया था उस समय भी रक्षाबंधन पुलिस, सीआरपीएफ के साथ अमृतसर के 25 केंद्रों में मनाया गया, जिससे किसी भी जवान को यह नहीं लगे कि वह घर से बहुत दूर केवल देश के दुश्मनों से जूझ रहा है। उसे शक्ति देने वाली शक्ति की बेटियां उनके साथ हैं, ऐसा अनुभव हर सीमा रक्षक जवान का था।
खेमकरण तरनतारन से लेकर डेरा बाबा नानक तक सीमा की रक्षा में डटे जवानों को भी कई बार राखी बांधी गई। हुसैनीवाला बार्डर भी हमारी राखी से अछूता न रहा।
हमारी राखी बहुत भाग्यशाली है जिसने पंजाब में आतंकवाद से जूझने वाली पुलिस फोर्स का नेतृत्व करने वाले श्री केपीएस गिल और उनके साथ उनके सैकड़ों जवानों को एक ही दिन राखी बांधी। इस राखी के बदले कोई छोटे-मोटे उपहार नहीं मिले, अपितु यह वचन मिला कि अगले रक्षाबंधन तक आतंक पर नकेल पड़ जाएगी। सच ही सिद्ध हुई वीर वाणी और 1993 की राखी आतंक पर नकेल पड़ने के बाद ही मनाई गई। 1970 में अमृतसर के किला गोबिंदगढ़ में सेना के जवानों के साथ भी राखी मनाई जो आज तक चल रही है। दो चार वर्ष ही ऐसे आए जब सैनिक यह राखी न मना पाए। देश की सभी बहन बेटियों से और राखी बंधवाने वाले भाइयों से यह अपील है कि राखी नोटों का त्यौहार नहीं, गहने और कपड़े लेने-देने का अवसर नहीं, यह सिरों का सौदा है। हमारी राखी में इंद्राणी की राखी जैसी शक्ति है,
महारानी कर्मवती की राखी जैसा संदेश है और बंगाल के भाई बहनों के राष्ट्रहित किए गए आंदोलन की भी चमक अपनी राखी में है। अंग्रेजों के विरुद्ध जितने अभियान स्वतंत्रता के लिए चलाए गए उसमें पहला बंग-भंग ही है जो लाॅर्ड कर्जन के अत्याचारों के बाद भी सफल हुआ और बंगाल का विभाजन रुक गया। रक्षाबंधन के दिन महान स्वतंत्रता सेनानी और कवयित्री सुभद्रा कुमारी चैहान की राखी की चुनौती कौन भूल सकता है।
सुभद्रा कुमारी ने देश के बेटों से सीधा प्रश्न किया था
आते हो भाई, पुनः पूछती हूं..
कि माता के बंधन की है लाज तुमको
तो बन्दी बनो देखो, बंधन है कैसा,
चुनौती यह राखी की है आज तुमको।
आज देश की बेटियां भी सेना में सशक्त प्रहरी हैं। सीमा सुरक्षा बल और देश के अन्य सभी बलों में सेवारत रही हैं। राखी बांधते समय ध्यान रखना होगा कि यह रक्षाबंधन है, भारत का बेटा या बेटी
जो भी शस्त्र हाथ में लिए देश की रक्षा के लिए सिर देने को तैयार बैठा है उन सबके लिए राखी है, केवल बहन की राखी भाई के लिए नहीं, बहादुर बहनों के लिए भी है। आइए राष्ट्र रक्षा के संकल्प के साथ राखी मनाएं। हमारी राखी पिछले पचास वर्षों से वीर भाई-बहनों के हाथ पर बंधकर शान से मुस्कुरा रही है।

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