साहित्यकारों की विरासत को सहेजने में विफल रही बिहार सरकार: पुष्मम प्रिया चौधरी

पटना, 22 जुलाई 2020 : ‘राज्य की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को भविष्य की पीढ़ियों के लिए संरक्षित करने और पूरे देश में एक मजबूत सांस्कृतिक जीवंतता बनाए रखने के लिए तत्पर और कार्यरत है’ , का दावा करने वाला कला संस्कृति एवं युवा विभाग, बिहार सरकार की कथनी और करनी में बहुत बड़ा फर्क दिखता है. कथनी के विपरीत बिहार में साहित्यकारों के विरासत को सहेजने में विभाग का कोई भी प्रयास दिखाई नहीं देता.

बिहार में साहित्यकारों की विरासत को उपेक्षित रखे जाने पर पुष्पम प्रिया चौधरी ने कहा कि सरकार ने राष्ट्रकवि दिनकर औऱ रामवृक्ष बेनीपुरी की विरासत का अपमान किया है. 

उन्होंने रामधारी सिंह दिनकर, रामवृक्ष बेनीपुरी, विलियम शेक्सपियर और पाब्लो नेरुदा के बीच तुलना करते हुए लिखा कि “पहले घर में ओजस्वी कवि रामधारी सिंह दिनकर रहते थे, दूसरे में रामवृक्ष बेनीपुरी, तीसरे में विलियम शेक्स्पीयर और चौथे में पाब्लो नेरूदा अंतर ये है कि बिहार में अवस्थित पहले दो या तो भुला दिए गए हैं या उपेक्षा के शिकार हैं जबकि अंतिम दो विख्यात टुरिस्ट डेस्टिनेशन हैं. ब्रिटेन में शेक्स्पीयर हाउस म्यूजियम में हर साल 8 लाख लोग आते हैं और इसकी वार्षिक आय 108 करोड़ है जबकि चिली में नेरूदा के हाउस म्यूजियम में 3.5 लाख पर्यटक आते हैं और आय भी करोड़ों में. इसमें लोकल इकॉनमी को हो रहे लाभ और रोज़गार सृजन शामिल नहीं हैं.

सुश्री चौधरी ने लिखा कि बिहार में ऐग्रिकल्चर, इंडस्ट्री और सर्विस सेक्टर में तो अनंत सम्भावनाएँ हैं ही, लेकिन बिहार में आय, आत्मनिर्भरता और रोज़गार के साधन हर जिले, हर क्षेत्र में स्थानीय रूप से उपलब्ध हैं, बशर्ते कि सिमरिया और बेनीपुर जैसे जगहों की कल्चरल और ईकोनॉमिक वैल्यू को समझा जाय, और सबसे महत्वपूर्ण नीयत और विज़न हो.

कला, धरोहर और सहित्य-संस्कृति का संरक्षण, संवर्धन एवं विकास कर बिहार को संस्कृति के क्षेत्र में परिपक्व राज्य के तौर पर बनाने का विभागीय विजन सरकारी कार्यालयों की लाल फीताशाही और काले कारनामों में दबकर गायब हो गई है.

किसी भी राज्य की पहचान वंहा की साहित्य- कला-संस्कृति से होती है और यदि उस राज्य में भी सम्मान नहीं दिया जाएगा तो यह सरकार के सांस्कृतिक दिवालियापन का सूचक है.

नया दशक 2020-30 ऐसी सभी विरासतों को सम्मान और अवसर में बदलने का दशक होगा. बंद पड़े तालों को खोलने और उजड़ चुके सम्मान की वापसी का समय होगा.

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