नोटबंदी का फ़ैसला पीएम मोदी ने क्यों लिया आप भी पढ़ें…

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प्रधानमंत्री ने नोटबंदी जैसे ऐतिहासिक कदम के लिए अपने कुछ ऐसे भरोसेमंद अफसरों को चुना, जिन्हें देश के वित्तीय हलके में कम लोग ही जानते थे। उनके इस कदम ने रातोरात देश की 86 फीसदी नकदी को बेकार कर दिया और अर्थव्यवस्था को भारी मुश्किल में डाल दिया है।

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राजस्व सचिव हसमुख अधिया के साथ पांच अन्य जिन लोगों को इस बात की जानकारी थी, उन्होंने इसे बेहद गोपनीय रखा। उनके साथ युवा रिसर्चर्स की एक टीम थी जो प्रधानमंत्री के नई दिल्ली स्थित ऑफ़िस में ही बैठकर काम करती थी। यह गोपनीयता इसलिए बेहद जरूरी थी, ताकि पहले से जानकारी हासिल कर संदिग्ध लोग सोना, प्रॉपर्टी या अन्य कोई संप‍त्ति ख़रीदकर अपने काले धन को ठिकाने न लगा लें।

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सूत्रों के मुताबिक वित्त मंत्रालय के प्रमुख अधिकारी अधिया बैकरूम टीम के समर्थन के साथ इस पूरे अभियान पर नज़र रखे हुए थे। जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे तो 58 वर्षीय अधिया साल 2003 से 2006 तक नरेंद्र मोदी के प्रमुख सचिव रह चुके हैं। इसलिए उनका मोदी से बहुत ही करीबी रिश्ता है। किसी मसले पर गहराई से चर्चा करनी होती है तो दोनों आपस में गुजरात में बात करते हैं।

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नरेंद्र मोदी की बीजेपी सरकार का सबसे बड़ा वादा काले धन को वापस लाने का था, इसलिए सरकार पर अब कुछ बड़ा कदम उठाने का दबाव था। सूत्रों के अनुसार एक साल पहले मोदी ने वित्त मंत्रालय, केंद्रीय बैंकों के अधिकारियों और कई थिंक टैंक से इस बात पर मंथन किया था कि काले धन पर कार्रवाई को कैसे आगे बढ़ाया जाए।

इसमें मोदी ने इन सवालों पर जवाब मांगे थे कि देश में कितनी तेजी से नए नोट प्रिंट किए जा सकते हैं, उनका वितरण कैसे होता है, यदि सार्वजनिक बैंकों में काफी रकम जमा हो जाए तो उन्हें क्या फायदा होगा और नोटबंदी से किसे फ़ायदा होगा? हालांकि यह सारे सवाल अलग-अलग तरीके से पूछे गए थे ताकि कोई इस बात का अंदाजा न लगा पाए कि सरकार ऐसा करने की योजना बना रही है। असल में सरकार ने इस बारे में बेहद गोपनीयता इसलिए रखी कि अगर यह सूचना किसी भी तरह से लीक होती तो यह पूरी कवायद बेमतलब हो जाती।

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