मोनिका अग्रवाल की कहानी उनकी ज़ुबानी… पढ़िए पूरा मामला

मैं  कंप्यूटर विषय से स्नातक हूं।अपने जीवन के अनुभवों को कलमबद्ध करने का जुनून सा है । जो मेरे हौंसलों को उड़ान देता है। मैंने कुछ वर्ष पूर्व टी वी,सिनेमाहाल के लिए कुछ विज्ञापन गृहशोभा के योगा विशेषांक के लिए फोटो शूट में भी काम किया। मेरी कविताएँ वर्तमान अंकुर, हमारा पूर्वांचल ,वेब पत्रिका “हस्ताक्षर” ,लोक जंग, दिल्ली से निकलने वाला पेपर “मैट्रो” में भी मेरी कविताओं का प्रकाशन होता रहता है। हिमाचल से प्रकाशित गिरिराज में मेरी एक बाल कविता को भी स्थान मिला । साथ ही अमर उजाला,  रूपायन, गृहशोभा, सरिता, मुक्त,  मेरी सजनी, फेमिना, बाल भास्कर, अमर उजाला और दैनिक जागरण में भी मेरी कहानी और रचनायें प्रकाशित होती रहतीं हैं ।

मेरे आंगन में नाच रही है, कुंदन सी चमकीली धूप

मने में बैरन आग लगाए, कैसा यह बफ़ौली धूप

जमुना तट पर रोज़ नहाने आती है सखियों के संग

गोरी गोरी अलबैली सी पागल सी यह शर्मीली धूप

चैन कहां, आराम कहां है, अखियन में है नीर कहां

रात अंधेरे उठ जाती है साजन को मतवाली धूप

बिजली चमके ज़ोर पवन का निमोही घनघोर घटा

सोच रही हूं कब आएगी सपनों की रखवाली धूप

गोरी अपना घूंघट ताने यूं जाती है काली कोस

पेड़ो के उस छोर से जैसे निकली हो शर्मीली धूप

खेतों से हल जोत के आए ताक रहे हैं नीला गगन

बस्ती बस्ती सामान लाना रूठ के जाने वाली धूप

अब के बरस क्यों बदला मौसम का है लगता रूप

कोमल कोमल फूलों पर है नीली काली पीली धूप

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