उत्तर प्रदेश से है ताल्लुक़ फिर भी बिहार की शिक्षा व्यवस्था में कर रहें है सुधार, जानिये कौन हैं वो शख्सियत

उत्तर प्रदेश के बागी बलिया जिला के कोटवा नारायणपुर गांव में जन्मे केदारनाथ पाण्डेय का व्यक्तित्व और कृतित्व विरल है | यह भी एक विरल तथ्य है की उनका संपूर्ण कृतित्व उनके समग्र व्यक्तित्व का सच्चा पारदर्शी प्रतिरूप है | अध्यापन,शिक्षा प्रसार ,संगठन, लेखन ,समाज सेवा का मन में भाव इन विविध क्षेत्रों में पाण्डेय जी की संपूर्ण सक्रियता लोक चिंतन के जिस सूत्र में ग्रथित किया जा सकता है वह भी विरल है |

शिक्षा के क्षेत्र में कुछ विशिस्ट करने का मन में संकल्प लेकर बिहार के सारण को अपनी कर्मभूमि बनाकर लगभग पाँच दशकों से बिहार की शिक्षा और शिक्षकों के एक सशक्त प्रहरी के रूप में स्थापित कर अपने को समर्पित योद्धा के रूप में अग्रणी भूमिका का निर्वहन करते आ रहे हैं |

केदारनाथ पाण्डेय ने जब अध्यापन कार्य प्रारम्भ किया तब विद्यालय निजी प्रबंधन के अधीन थे और काफी कम वेतन का वह दौर था लेकिन मन मे कोई गलानि का भाव नही था ,सारण से जब सिवान १९७३ में अलग जिला बना तब श्री पाण्डेय जी सिवान जिला माध्यमिक शिक्षक संघ के सचिव बने यही से उनके मन में शिक्षा और शिक्षकों की दशा और सुधार के लिए प्रचार और प्रसार का बीड़ा उठाया अपनी कर्मठता के बलबूते बिहार माध्यमिक शिक्षक संघ की केन्द्रीय समिति का मुख्य हिस्सा बन गए और प्राच्य प्रभा का संपादन प्रारम्भ किया |

शिक्षकों के स्नेह और दबाव में पांडेय जी १९९२ में बिहार माध्यमिक शिक्षक संघ के महासचिव बने और लगातार इस पद पर लम्बे कार्यकाल तक बने रहे |

अध्यक्ष शत्रुध्न प्रसाद सिंह के साथ मिलकर संगठन को सशक्त और मजबूत बनाने का कार्य किया ,आज अध्यक्ष के तौर पर शिक्षकों की समस्याओं के निदान के लिए सतत संघर्षशील हैं |

केदारनाथ पाण्डेय का शिक्षक काल एक संघर्ष पूर्ण यात्रा का गवाह रहा है जब मित्रों की सलाह पर सरकारी सेवा का त्याग कर १९९६ में शिक्षकों के प्रतिनिधि के तौर पर विधान परिषद का चुनाव लड़ने का फैसला किया लेकिन चुनाव हार गए

अपना प्रथम चुनाव हारने के बाद भी कभी निराश नही हुए और ज्यादा ढृढ़ संकल्प के साथ मन में देश की शिक्षा में गुणवत्ता लाने ,शिक्षकों के वेतनमान में बढ़ोतरी शिक्षा की बदहाली को दूर करने का जज्बा और उत्साह के साथ कभी न हार मानने वाले केदारनाथ पाण्डेय ने हार में ही जीत है और हार के अन्दर छुपे हुए जीत के संदेश तथा कार्ल मार्क्स के कथन श्रम ही सफलता की कुंजी है को आत्मसात करते हुए, सफलता की खोज के साथ चुनाव के मैदान में खड़े हुए और २००२ के विधान परिषद के चुनाव में भारी मतों से विजय प्राप्त की तब से अभी तक पीछे मुड़कर कभी नहीं देखा और लगातार १८ वर्षों से सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से प्रतिनिधित्व कर रहे हैं |

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