BeehadKaBaghi: स्टार कास्ट दिलीप आर्या की संघर्ष भरी कहानी

इंज़माम वहीदी, मुम्बई: एक बच्चा जिसने बचपन में मज़दूरी कर अपनी ज़िंदगी गुज़ारी। काफ़ी मेहनत मशक़्क़त कर एक अलग पहचान बनाई। एक फिल्म़ में मुख्य अभिनेता का किरदार बख़ूबी निभाते हुए सर्वश्रेष्ट अभिनेता के अवार्ड से नवाज़ा जाए तो क्या आप यक़ीन करेंगे ? जी हां आज हम आपको एक ऐसी शख़्शियत से रूबरू करवाने जा रहे हैं।

दिलीप आर्या एक ऐसा नाम है जो कि एक गांव से ताल्लुक़ रखते हैं। उनका जन्म 3 जुलाई 1980 में हुआ था। आज 21वीं सदी में युवा पीढ़ी के लिए मार्ग दर्शक एवं प्रेरणास्रोत बने हुए हैं। दिलीप आर्या का वास्तविक नाम दिलीप कुमार है लेकिन उन्हें इंडस्ट्री में दिलीप आर्या के नाम से जाना जाता है।

सन् 1985 में दिलीप के बचपन में ही उनके पिता का देहांत हो गया। घर के मुखिया के जाने के बाद पूरा परिवार बिखर सा गया था। ऐसी स्थिति में मां ने बच्चों की ख़ातिर मज़दूरी करना तय किया। तेज़ धूप में मां को खेतों में निराई, गुड़ाई करता देख, दिलीप और उसके बड़े भाई ने भी मज़दूरी करना शुरू कर दिया। क्योंकि दिलीप उम्र में छोटे थे उसे देहाड़ी बड़ों की अपेक्षा कम मिलती थी।

काम में नुकसान ना हो इस कारण उसे मज़दूरी पर कभी-कभी लोग नही ले जातें थे। दिलीप को इस बात का बहुत दुःख होता था और वो ज़ल्द से ज़ल्द बड़ा हो जाना चाहते थे ताकि अपने भाई और मां के साथ मिलकर घर का बोझ उठा सकें, उन दिनों मज़दूर की दिहाड़ी सिर्फ़ पाँच रूपये हुआ करती थी। दिलीप ज्यादा से ज्यादा समय तक काम पर लगे रहते थे। आज के दौंर में काम से छुट्टी मिले तो खुशी मिलती है लेकिन दिलीप के साथ ऐसा कभी नहीं रहा वह ज़्यादा से ज़्यादा काम करना चाहते थे।

दिलीप के पिता पेशा मेसन (राज मिस्त्री) का था। स्वर्गीय गंगा सागर जी के निधन (1985) के बाद उनकी माता का पेशा कृषि श्रम बन गया। बड़े भाई अनीश कुमार ने बड़े होने के फ़र्ज़ को बख़ूबी अंजाम दिया। पिता के निधन के बाद उन्होंने मज़दूरी करते हुए परिवार का ख़र्चा उठाया। दिलीप आर्या 6 भाई और बहन हैं, 3 भाई और 3 बहने हैं। उन्होंने ने भी अपने परिवार के दो सिरों को पूरा करने के लिए 11 साल की उम्र में ही मज़दूरी करनी शुरू कर दी थी। 7 से 8 घंटे की कड़ी मेहनत के बाद उन्हे कुछ रूपये मिलते थे जिससे परिवार की रोज़ी-रोटी चलती थी।

एक छोटे गांव से मुबंई जैसे शहर का रास्ता कितना मुश्किल भरा हो सकता है ये आप अंदाजा नहीं लगा सकते। दिलीप महानगरी मुम्बई तो पहुंच गए थे लेकिन उन्हें पता नहीं कि वह कहां रहेंगे , क्या खाएंगे और कैसा काम करेंगे ? आमतौर पर महानगर में ज़िंदगी गुजारने का बजट आम बजट से कहीं ज्यादा होता है। दिलीप के इरादे मज़बूत और हौसले बुलंद थे, उन्हें जुनून था कि अपने ख़्वाब को सच कर दिखाना है। किसी भी हाल में सपने को साकार करना ही है। अब आप को दिलीप के गांव के बारे में बताता हूं। उनके गाँव का नाम अमौली है जो कि तहसील बिंदकी जिला फतेहपुर, उत्तर प्रदेश में स्थित है। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा वहां के प्राइमरी विद्यालय में हुई। उनका बचपन मज़दूरी के पसीने में लिपटा परेशानी भरा था। इसके अलावा उनके सामने कोई और विकल्प भी तो नहीं था। फिर भी उन्होंने अपना हौसला बुलंद रखा आगे की पढ़ाई की, स्नातक और परास्नातक की डिग्रियां लीं।

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