लाइन में नहीं दिखे हुक्मरान और नौकरशाह क्या है माजरा ?

सोनभद्र। हज़ार और पांच सौ की नोट बंदी के बाद से सिपाही से लेकर विधायक, मंत्री, सांसद या उनके कोई प्रतिनिधि या यूं कहें कि किसी न किसी क्षेत्र में प्रभाव रखने वाला कोई भी व्यक्ति या बड़ा व्यापारी बैंकों पर लाइन में लगा नहीं दिखा। पर काम किसी का नहीं रुका है। उनके यहां शादी समारोह से लेकर हर आयोजन धूमधाम से हो रहे हैं। सिर्फ और सिर्फ दिक्कतें हैं तो आम आदमी की, जिसका कोई प्रभाव नहीं है।

बैंकों में अभी भी दो और चार हजार रुपये निकालने के लिए हर दिन लाइन भी उनहीं की लग रही है।ऐसे में हर किसी के ज़ेहन में एक सवाल कौंध रहा है कि नोट बंदी किसको प्रभावित करने के लिए की गई ? क्या वह इससे प्रभावित हुआ।

atm line

नोटबंदी के पहले ही दिन से बैंकों के अधिकारियों, कर्मचारियों के साथ ही पुलिस प्रशासन को आशंका थी कि नेता, विधायक, मंत्री या उनके प्रतिनिधियों के साथ ही प्रभावी लोगों की लाइनें बैंकों की शाखाओं में लगेंगी। इसलिए जिला प्रशासन से ने बैंकों के अधिकारियों के साथ बैठक कर पुख्ता इंतजाम भी कर लिया था। लेकिन नोटबंदी के पहले दिन भी आम आदमी दिखे। थोड़ा बहुत हो हल्ला होने पर पुलिसकर्मियों ने ही डांट डपटकर शांत करा दिया।

पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को उम्मीद थी कि दूसरे दिन या फिर भीड़ के कम होने पर नेता और प्रभावी लोगों की लाइन लगेगी। लेकिन सच तो यह है कि शहर से लेकर गांव तक एक भी प्रभावी व्यक्ति लाइन में कभी नहीं दिखा। बैंकों के अधिकारी, कर्मचारी, पुलिस के जवान भी दबी ज़ुबान इसे स्वीकार कर रहे हैं। वह यह भी कह रहे हैं कि लाइन में लगने वाला आम आदमी, किसान या छोटा मोटा व्यापारी है,जिसका बैंकों तक कोई प्रभाव नहीं है।

ऐसे में सवाल उठना लाज़्मी है कि उनके घरों का काम कैसे चल रहा है। कहीं ऐसा तो नहीं कि बैंकों ने इनके लिए कोई दूसरा रास्ता निकाल रखा हो। यदि ऐसा नहीं है तो इसकी गंभीरता से जांच होने से नई कहानी सामने आ सकती है।

बैंकों के कर्मचारी और अधिकारी भी कभी लाइन में नहीं दिखे। नोटबंदी के बाद से तो उनको भी ज़रूरत हुई होगी। उनके भी परिवार में शादियां और अन्य आयोजन हुए होंगे। उन्होंने इन आयोजनों को कैसे निपटाया इसका भी डाटा तैयार किया जाना चाहिए। जिससे जनता के सामने सारी स्थिति खुले तौर पर दिखें। देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सपनों के अनुसार कार्यों में पारदर्शिता दिखना भी चाहिए। रिजर्व बैंक की मंशा भी पूरी होनी चाहिए।

जिले में बीस दिनों से बंद चल रहे एटीएम और ग्रामीण क्षेत्रों की बैंक शाखाओं का भी हिसाब चेक किए जाने की जरूरत है। अधिकांश एटीएम तो काम ही नहीं किए हैं। ग्रामीण क्षेत्रों के एटीएम से बीस दिनों में एक भी नोट नहीं निकली है। अलबत्ता अधिकांश के शटर ही गिरे हैं। जबकि आस-पास के जिलों में ऐसी स्थिति नहीं है। इसलिए लोगों का कहना है कि इसकी जांच करायी जाए। कहीं इसमें भी कोई घालमेल तो नहीं चल रहा है।

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