मित्रता अभी के समय में सिर्फ नफा नुकसान लेन-देन तक ही सीमित है

अभय राज झा, पटना : “फ्रेंडशिप डे” पर आज सभी अपने- अपने मित्र को बधाई संदेश भेज रहे हैं। अच्छी बात है क्योंकि इसी बहाने( मित्रता जो कि अभी के समय में सिर्फ नफा नुकसान लेन-देन तक ही सीमित है ) और सच्ची मित्रता विलुप्त ही होती जा रही हैं, उसे बल मिलेगा।
भारतीय इतिहास में भी बहुत सारे सच्ची मित्रता के मिसाल हुए हैं, उन्हीं में से आज हम” कृष्ण एवं सुदामा” की मित्रता के बारे में चर्चा करते हैं।
सुदामा जो कि एक गरीब ब्राह्मण है मुट्ठी भर चावल के साथ ,अपने परम मित्र द्वारकाधीश श्री कृष्ण के पास मिलने जाते हैं और उपहार में वही मुट्ठी भर चावल श्रीकृष्ण को देते हैं। कृष्ण मुट्ठी भर चावल के बदले में दुनिया की सारी संपत्ति दे देते हैं। सुनने में हमें यह बहुत विचित्र लगता है ,पर हम यहाँ यह देखने में असफल हैं , कि गरीब सुदामा के लिए मुट्ठी भर चावल लाना भी मुश्किल है। सुदामा इतना गरीब, भिखारी, है कि एक मुट्ठी चावल लाना भी बहुत ज्यादा है।इसलिए उसका उपहार अधिक महत्वपूर्ण है ,कृष्ण की तुलना में वह असली दाता है, कृष्ण नहीं।
लेकिन हम इसे अलग तरह से देखते हैं, हम मात्रा को देखते हैं न कि उपहार की गुणवत्ता को। हम नहीं जानते कि कैसे एक मुट्ठी चावल इकट्ठा करना सुदामा जैसे भिखारी के लिए मुश्किल हुआ होगा, कृष्ण के लिए बहुत सारा धन दे देना उतना मुश्किल नहीं था , वह एक राजा है , सुदामा पर विशेष कृपा नहीं कर रहे हैं, वह केवल प्रतिक्रिया दे रहे हैं । अपने दोस्त के उपहार के बदले उपहार दे रहे हैं। और मुझे लगता है कि कृष्ण सुदामा को दिए अपने स्वयं के उपहार से उतना संतुष्ट भी नहीं हैं। सुदामा का उपहार दुर्लभ है , वह बेसहारा है। मेरी नज़र में सुदामा कृष्ण से बड़े दोस्त के रूप में चमकते हैं।
गौरतलब है कि सुदामा किसी भी एहसान के लिए नहीं, बल्कि सिर्फ अपनी मित्रता, अपने जीवन को व्यक्त करने के लिए कृष्ण के पास आए थे ,उन्हें प्यार देने आए थे। बेशकीमती उपहार के साथ। आमतौर पर गरीब कुछ प्राप्त करना चाहता है । वह शायद ही कभी कुछ देता है। यहाँ सुदामा उपहार के साथ आते हैं, उपहार के लिए नहीं।

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