मोहब्बत की अजीब दास्तान… पढ़कर हैरान रह जाएंगे आप… पार्ट-1

अलस्सुबह नींद के आग़ोश से बाहर आती हूँ तो अक्सर अम्मी की आँखों को दरीचे के पार दूर फ़लक के किसी कोने में घूरते हुए पाती हूँ। जैसे उम्मीदों की कोई शक्ल मुजस्सम हुआ चाहती हो। आँखों में तैरता आब सिहरन पैदा करता है। मैं भी बिस्तर से उठ जाती हूँ और अम्मी के पास पहुँच कर उनके कंधे पर सिर टिका देती हूँ। अम्मी आहिस्ता-से मेरे सिर पर हाथ फेरती हैं और हम दोनों वापस ड्राइंग रूम में आकर बैठ जाते हैं।

अम्मी को मैं हँसाने की कोशिश करती हूँ। कोई लतीफ़ा सुनाती हूँ तो अम्मी इतने ज़ोर से हँसती हैं कि मुझे समझने में कोई मशक़्क़त नहीं करनी पड़ती कि वे महज़ मेरा मन रखने के लिए नक़ली ख़ुशी का लिबास ओढ़ रही हैं। मैं बग़ल के कमरे से तानपूरा लाती हूँ और अम्मी से उनके पसंदीदा नग़मों में से कोई एक-दो सुनाने की फ़रमाइश करती हूँ। अक्सर अम्मी तानपूरा मेरे हाथ से अपने हाथ में ले लेती हैं और कहती हैं कि तूने अपने वालिद का गला पाया है चल तू ही सुना! इसी के साथ तानपूरे के तार झंकृत हो उठते हैं। मैं जानती हूँ कि अम्मी मुझसे बेहतर गाती हैं, पर मैं एक-दो इबादत और सूफ़ी गाने बिना किसी हुज्जत के शुरू कर ही देती हूँ। अब तक अम्मी का मन कुछ बेहतर हो चुका होता है तो वे हिंदुस्तानी मूसीक़ी के राग दरबारी, मालकौंस या यमन कल्याण के कुछ गाने सुनाती हैं। ये राग उनके पसंदीदा हैं।

आख़िर में हम किसी नए सफ़र की तैयारी का तय करते हैं और रोज़मर्रा के काम पर लग जाते हैं। इसे हमारे मुस्तक़बिल की मुस्तक़िल मिज़ाजी ही समझिए। मैं हर हफ़्ते-दो हफ़्ते के दरमियान किसी-न-किसी सफ़र पर अम्मी को लेकर जाती हूँ। उनके चेहरे पर ख़ुशियाँ देखना मेरे लिए दुनिया-जहान की बड़ी-से-बड़ी सौग़ात से बेशक़ीमती है। इसके अलावा ज़्यादा कुछ मैं सोच नहीं सकती। अपना मुल्क अफ़ग़ानिस्तान जब छूटा तो महज़ ग्यारह-बारह साल की रही होगी मेरी उम्र। बस ख़ौफ़ के कुछ साये पीछा करते हैं और माज़ी के कुछ क़तरे ज़ेहन में जैसे यक-ब-यक उड़ते-से कहीं से चले आते हैं। उस वक़्त ऐसी ज़हानत नहीं थी मुझमें कि चीज़ों को बहुत शिद्दत से महसूस कर पाऊँ। अम्मी की निगाहों से गुज़रे दिनों की तसवीरें पहचानने की कोशिश करती हूँ। उनकी ज़ुबान से ही गुज़श्तः अफ़साने सुनती हूँ तो ख़यालों में वाज़-ए-शक्ल की पैमाइश की भी कोशिश करती हूँ।

अम्मी बताती हैं कि वह 1991-92 का साल रहा होगा जब अब्बू से उनकी पहली मुलाक़ात हुई। शहर हेरात था। हरीरूद दर्या के किनारे अम्मी चहलक़दमी कर रही थीं। हमारा ख़ानदान वालिए-रियासत के मानिंद था तो अम्मी के साथ एक बॉडीगार्ड भी हमेशा मुस्तैद रहता था। यह वह दौर था जब पूरा अफ़ग़ानिस्तान मैदान-ए-जंग में तब्दील हो चुका था। तालिबानी हरक़तें पूरे उफान पर थीं। ख़ैर, दर्या के किनारे चलते-चलते अम्मी कुछ दूर तलक गईं कि अचानक पहाड़ी की तरफ़ से एक पत्थर आसमान में उछला। अम्मी उसके निशाने पर थीं। पत्थर पर निगाह पड़ते ही अम्मी दो क़दम पीछे हटीं, तो देखा कि बमुश्किल मीटर भर बाजू में एक नौजवान से जनाब बैठे-बैठे दर्या में कंकड़ उछालने में मश्ग़ूल थे। ज़ाहिर था कि पीछे हटते ही अम्मी तो साफ़ बच जातीं, पर वह पत्थर उस नौजवान के सिर पर जा लगता और वह लहूलुहान होने से न बचता। आनन-फानन में अम्मी फिर आगे बढ़ीं और पूरी ताक़त से उस पत्थर को अपने हाथों में लपक लिया। गिरते-गिरते बचीं, पर नुकीला पत्थर उनकी हथेली को जख़्मी कर गया। आसपास की हरक़त से उस नौजवान का ध्यान भंग हुआ तो उसने सिर पीछे घुमाया। उसे माज़रा समझते देर न लगी और अम्मी की मदद के लिए उठकर आगे बढ़ा, लेकिन अम्मी ने उसे अपनी जगह रहने का इशारा किया और बग़ैर कुछ बोले हाथ में रूमाल की पट्टी बाँधकर बॉडीगार्ड भाईजान के साथ घर को रवाना हो गईं।

हरीरूद का किनारा अम्मी की पसंदीदा जगहों में से एक था। वे ख़ाने-जिहाद या मिल्लत पार्क के लिए भी निकलतीं तो भी शाम को अक्सर दर्या के किनारे चली जातीं। हथेली का जख़्म कुछ भरा तो हफ़्ते बर बाद वे फिर हरीरूद के आग़ोश में जा पहुँचीं। तअज्जुब! आज फिर वही नौजवान बैठे-बैठे दर्या में कंकड़ उछाल रहा था। अम्मी को अजीब लगा। पहले तो उसे यहाँ कभी देखा न था, पर अचानक से दो बार लगातार वह सामने आ पड़ा था। अम्मी चुपचाप उसके बग़ल से गुज़रने लगीं तो वह यक-ब-यक उठा और अम्मी के सामने जाकर हाथ जोड़ लिए। अम्मी ठिठक गईं। उसने पश्तो में कहा—‘मुझे आपसे ज़रूरी बात करनी है।’ अम्मी अचंभे में थीं। बोलीं—‘जनाब आप अफ़ग़ान तो दिखते नहीं और इतनी बेहतरीन पश्तो!’ नौजवान ने बताया कि वह हिंदुस्तानी है और उस वाक़ये के बाद वह रोज़ शाम को दर्या किनारे इस उम्मीद में आता है कि शायद किसी दिन मुलाक़ात हो जाए। उसने कहा—‘मोहतरमा, आपने मुझ जैसे एक अजनबी को बचाने के लिए ख़ुद को ख़तरे में डाला, इसका एहसान मैं कैसे चुका सकता हूँ।’ अम्मी ने कहा—‘आप फ़िक्र न करें, मैंने मेरा फ़र्ज़ अदा किया है, बस। अगर आप जख़्मी हुए होते तो मेरे ज़ेहन में ही एक बोझ बन जाता।’ ख़ैर, अम्मी ने कोई और बात करने से मना कर दिया और अपने रास्ते चल दीं। लेकिन वह नौजवान भी कहाँ कम था। उसने दर्या किनारे आने-जाने वालों से पता कर लिया कि यह लड़की आएदिन यहाँ घूमने आती है। फिर तो क्या था, वह आएदिन अम्मी की राह में आ पड़ता। आख़िर एक दिन अम्मी को कुछ ज़्यादा रहम आई और बॉडीगार्ड भाईजान को थोड़ा दूर बैठने को कहकर उस नौजवान से मुख़ातिब हुईं—‘बोलिए जनाब, जितना एहसान जताना हो, आज इतमीनान से बोल दीजिए और आगे से मेरे लिए परेशानी का सबब मत बनिए।’ और, नौजवान ने जैसे ही कहा—जी मोहतरमा, मैं एक हिंदुस्तानी खुफ़िया अफ़सर हूँ—तो अम्मी बेतरह सक्ते में आ गईं। कुछ देर की ख़ामोशी के बाद नौजवान ने कहा—‘मैं अपना असली नाम नहीं बता सकता, क्योंकि देश की हिफ़ाज़त का सवाल है, पर अब मेरे दिल पर ज़रूर मेरा क़ाबू नहीं रहा।’ इसके बाद नौजवान ने अपने हिंदू मज़हब और जाती ज़िंदगी की तमाम सारी असलियतें अम्मी के सामने खोलकर दीं। अम्मी चुपचाप सुनती रहीं और फिर धीरे से उठीं और रोज़ की तरह घर को रवाना हो गईं। अम्मी यह सोचते हुए चली थीं कि अब आगे से वे इस दर्या के किनारे जल्दी न आएँगी, पर ग़ज़ब यह हुआ कि उस वे रात ठीक से सो न पाईं। सुबह होते-होते जैसे सदाए-बर-नख़ास्त के दरमियान सदाए-ग़ैब कानों में पड़ी हो कि ऐसा साफ़दिल इनसान तुम्हें ताउम्र न मिलेगा कि जिसने अपना अच्छा-बुरा सब एकमुश्त बयान कर दिया। अम्मी करवटें बदलती रहीं और कहीं दूर से आती सदाए-बाज़-गश्त जैसे कानों के रास्ते दिल के दरवाज़े पर दस्तक देती रही। शाम हुई तो अम्मी के क़दम दर्या की तरफ़ जाने से रुक न पाए। वे भी अपना दिल उस नौजवान को सौंप चुकी थीं।

असली मुश्किलों के दिन तो अब शुरू होने वाले थे। अफ़ग़ानिस्तान जैसे मुल्क में, एक ऐसे दौर में, जबकि तालिबान अपने क़ायदे-कानून लाना चाह रहे हों, तो एक ग़ैरमज़हबी शख़्स के साथ मुहब्बत कोई आसान काम तो न था। बहरहाल, उस बॉडीगार्ड अक़रम भाईजान ने अम्मी की राह राह आसान बनाने में कोई कोर-कसर न रखी और आख़िरकार तमाम मुश्किलें पार करके साल भर बाद अंजाम निकाह तक जा पहुँचा। कुछ वक़्त बाद 10 जून, 1996 का वह दिन भी आया जब हम दो जुड़वाँ बहनों की किलकारियाँ घर में एक साथ गूँजीं।

हालात ऐसे हो रहे थे कि हेरात हमारे लिए ख़तरे का सबब बन रहा था। अम्मी-अब्बू ने फ़ैसला लिया कि वे काबुल में कोठी बनवाएँगे और वहीं बस जाएँगे। सो, हम काबुल आ गए। यों, काबुल भी तब कोई ज़्यादा सुकूनदेह नहीं रह गया था। अम्मी बताती हैं कि हम बहनें साल भर की भी नहीं हुई थीं, जबकि तालिबानी हुकूमत में फ़ौजों ने एशिया के मशहूर अफ़ग़ान म्यूजियम को बेतरह लूटकर बरबाद कर दिया था। इस म्यूजियम की इज़्ज़त ऐसी थी कि बौद्ध मज़हब भले हिंदुस्तान के नाम पर जाना जाता हो, पर जिसे इसकी गहरी समझ बनानी हो, तो उसके लिए इस म्यूजियम से होकर गुज़रना ज़रूरी माना जाता था। ख़ैर, बाद में हिंदुस्तान की हुकूमत ने भी मदद की और काफ़ी वक़्त बाद यह फिर अपनी पुरानी शक्ल अख़्तियार कर सका।

काबुल में बड़ी हुई तो बाग़-ए-बाबर, ईदगाह मस्ज़िद और बाला हिसार जैसी कई जगहों से जुड़ी बचपन की कुछ यादें रह-रहकर ताज़ा हो उठती हैं। वह याद भी भला कैसे भूलेगी, जबकि तालिबानी हुकूमत के ख़त्म होते-होते हमारी भी कोठी हमले का शिकार हुई और कोठी के सामने वाले दरख़्त के नीचे मैं ख़ुद गोलियों की तड़-तड़ के बीच फँस गई। अल्लाह की कारस्तानी देखिए कि एक तालिबान मेरे जैसी छोटी बच्ची पर बंदूक तान रहा था तो मेरी डबडबाई आँखों में एक दूसरे तालिबान को जैसे अपनी बच्ची नज़र आ गई और वह किसी भी क़ीमत पर मुझे बचाने आगे बढ़ आया। ख़ैर, अब्बू और बहन के लापता होने तक दर्दभरा अफ़साना है, हिम्मत पड़ेगी तो अगले किसी बयान में…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *