“ठेकेदारी पर बिहार सरकार”: पुष्पम प्रिया चौधरी ने किया प्रहार

पटना 26 जुलाई 2020: बिहार की नई राजनीतिक पार्टी प्लुरल्स की प्रेसिडेंट पुष्पम प्रिया चौधरी ने बिहार सरकार को संविदा की सरकार बताते हुए लिखा कि “ऐसा लगता है कि स्वास्थ्य विभाग को छोड़कर बाक़ी विभागों, मंत्रियों और अफ़सरों को छुट्टी दे दी गई है और वे सही मायनों में घर बैठे मुआवज़ा पा रहे. दरअसल बिहार में ठेकेदारी की ही सरकार है. एक बार में एक काम, वो भी काग़ज़ी! 15 साल तक नक़ली ‘सामाजिक न्याय’, फिर 5 साल में बह जाने वाले सड़क, फिर 5 साल में आती-जाती बिजली, फिर 5 साल में होम-डेलिवरी वाली शराबबंदी और झीलों को मारने वाली जल-जीवन-हरियाली. इस दौरान पब्लिक के हज़ारों-लाखों करोड़ पर पल रहे बाक़ी 27 विभाग के विधायक, मंत्री, नौकरशाह चिल कर सकते हैं और कृषि, लघु उद्योग, व्यापार में लगे लोग और राहत की आस देख रहे महिलाएँ-बच्चे अपना सिर धुन सकते हैं”.

सरकार की संविदा नीति पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि “यह सरकार संविदा की सरकार है. यंहा हर जगह संविदा पर कार्यरत लोग बहुतायत में हैं, शायद ही कोई विभाग है जंहा संविदा की नीति नहीं लागू की गई है”.

आम लोगों की तकलीफों को लेकर कहती हैं कि ‘मक्के-गन्ने का दाम नहीं मिल रहे हैं, कुटीर उद्योग के ग्राहक नहीं हैं और मेले में जो कमाते थे उस पर भी ताला लगा हुआ है. इनका जीवन यापन कैसे चलेगा इसपर सरकार खामोश है’.

लॉकडाउन के कारण समाज के मेहनतकश लोगों के सामने आजीविका का संकट आ खड़ा हुआ. उनके इस संकट पर वह कहती हैं कि ‘पटना के ड्रॉइंग रूम में बैठ कर तुग़लकी नियम बनाने वाले और ‘इन्स्पेक्टर राज’ वाले लॉकडाउन थोपने वालों को धरातल के डायनामिक्स की कोई जानकारी ही नहीं है. लाखों-करोड़ों रोज़मर्रा की आय पर जीने वाले समुदायों का आर्थिक जीवन छिन्न-भिन्न हो चुका है.

मूर्तिकारो के कार्यव्यापार बंद होने से पूर्वी चंपारण के मेहसी गाँव के कुम्हार जो भगवान को मिट्टी में अवतार देते हैं! जिनकी कला देखकर भगवान पर वैसे ही श्रद्धा बढ़ जाती है. लेकिन आज जब ग्राहक ही नहीं हैं, बिहार सरकार चुनाव का वर्चुअल मेला लगाने में तो रुचि लेती है, लेकिन धर्म के मेले पर पाबंदी है, तब मिट्टी के भगवान भी लाचार हैं और पूरा समुदाय भी’. बिहार सरकार मुआवज़ा दे रही है के बात पर पुष्पम प्रिया चौधरी ने कहा ‘मज़ाक़ मत कीजिए, “देंगे तो हम ही देंगे” वाली सरकार को पता भी नहीं है कि ऐसा कोई व्यवसाय भी है जिससे परिवारों और बच्चों की ज़िंदगी चलती है’.

सुश्री चौधरी ने कहा कि ब्रिटेन, फ़्रांस, कनाडा इत्यादि जैसे देश महज़ अर्थशास्त्र के नियमों के कारण विकसित और वेलफ़ेयर स्टेट नहीं हैं. वे विकसित इसलिए हैं क्योंकि वहाँ पॉलिसी-मेकिंग की सोच विकसित है जिसके केंद्र में पब्लिक है. पॉलिसी-मेकर पॉलिटिशीयन को पता है कि पैसा पब्लिक का है, और काम करके न तो वे कोई “सौग़ात” दे रहे हैं, ना “तोहफ़ा” ना तथाकथित “पैकेज”. कोरोना महामारी में ऐसे हर देश में छँटनी हुए या बिना वेतन छुट्टी दिए गए कामगारों को सरकार द्वारा 6-12 महीने तक प्रति महीने घर बैठे 2-3 लाख रुपए का मुआवज़ा दिया जा रहा है. कुछ राज्य सरकारों ने भी इस देश में कुछ तो पहल की परंतु बिहार में तो इसकी चर्चा तक नहीं है. कुछ लोगों के खातों में सगुन के 1000/- देकर ही ढोल भी पीट लिया गया और ज़िम्मेदारी भी ख़त्म. और बाक़ी काम?

अपने सरकार की रूपरेखा पर बताया कि “2020-30 के नए बिहार में पॉलिसीमेकिंग होगी और उसका कार्यान्वयन, एक मुश्त, एक साथ, क्योंकि जीवन एक ही है और वो किश्तों में नहीं चलता”.

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