हुकूमत और मीडिया पर क्या सोच रखते हैं छात्र, पढ़िये पुरा मामला

असजद: मेरे विचार से किसी भी देश के विकास में अच्छी हुकूमत और ईमानदार *मीडिया का होना बेहद ज़रूरी है। मीडिया सिर्फ खबर लेने से लेकर खबर जनता तक पहुँचाने तक ही सीमित नही होता । ये जनता और हुकूमत के बीच का एक ऐसा माध्यम भी है जिसपे जनता आँख बंद कर कर भी यकीन कर सकती है ।इसलिए शायद मीडिया का ईमानदार होना उतना ही ज़रूरी है जितना हुकूमत का ईमानदार और अच्छा होना। देश में बढ़ती हर समस्या का बेरोज़गारी , अर्थव्यवस्था , या शायद बिजली ,पानी के बुनियादी मुद्दे इन सब के लिए जितनी दोषी सरकार है उतने ही दोषी कुछ *मीडिया चैनल भी ।जब जब मीडिया (कुछ चैनल्स) को ज़रूरत थी कि सरकार से सवाल करे तब तब इन्होंने सरकार से सवाल पूछने के बजाए खामोश रहना या सरकार के साथ बोलना या फिर उन मुद्दों को भटकाना शुरू कर दिया जो देश के बहुत ही अहम मुद्दे थे। इन्होंने हुकूमत को उस बिगड़े बच्चे की तरह बना दिया जो गलतियाँ करती गयी और ये पर्दा डालते गए।हुकूमत इस बात से खुश है कि सवाल पूछने वाला कोई नही। पर क्या ये देश हित में है? और अगर जनता ने सवाल पूछना चाहा तो हुकूमत ये कह कर दुत्कार देती है कि आप को किसी ने गुमराह कर दिया है। गुमराह मीडिया भी हुआ या गुमराह होने का नाटक कर रहा और जनता को गलत खबर या खबर के मायने बदल कर गुमराह कर रहा है।
देश की समस्याओं के लिए हुकूमत , मीडिया और हम आप भी ज़िम्मेदार हैं । हमने भी सच जानने से पहले यकीन करना बेहतर समझा ।हमने हुकूमत चुनी फिर उस हुकूमत के बारे में जानने के लिए मीडिया चुना और फिर इन दोनो ने एक दूसरे को चुना और जनता फिर तकती रह गई। हाँ कुछ मीडिया चैनल्स ने ईमानदारी दिखाई तो कुछ को ईमानदारी की कीमत भी चुकानी पड़ी। कुछ लोग अब भी खड़े है ईमानदारी के साथ आपको बहुत बधाई, आपकी वजह से मीडिया पे यकीन आज भी कायम है।

*यहाँ ज़िक्र कुछ मीडिया चैनल्स का ही किया गया है
*हुकूमत के साथ मिल कर काम करना अच्छा है पर हुकूमत के लिए काम करना?*

*माफ करना , मगर सवाल पूछने वाला मीडिया अब खुद सवालों के घेरे में है।*

खैर इन सब में एक बात अच्छी हुई ड्रामा देखने को अब चैनल्स नही बदलने पड़ते क्यों कि मनोरंजक चैनल्स से ज़्यादा मनोरंजन अब न्यूज़ चैनल पे मिल जाता है।

ये मेरे अपने विचार है , और मेरा मकसद किसी पे सवाल उठाना नहीं है।

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